देहरादून और अमृतसर एयरपोर्ट पर बर्ड स्ट्राइक का खतरा, चील-कबूतर समेत 21 प्रजातियां हाई रिस्क; वन्यजीव भी चुनौती
देहरादून: जौलीग्रांट एयरपोर्ट और अमृतसर एयरपोर्ट पर पक्षियों के विमानों से टकराने का खतरा सामने आया है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के अध्ययन में दोनों एयरपोर्ट क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पक्षियों की मौजूदगी दर्ज की गई है। अध्ययन के मुताबिक, देहरादून के जौलीग्रांट और अमृतसर एयरपोर्ट पर कुल 21 पक्षी प्रजातियां विमानों के लिए अधिक जोखिम वाली श्रेणी में हैं।
अध्ययन के दौरान जौलीग्रांट एयरपोर्ट क्षेत्र में 57 पक्षी प्रजातियां दर्ज की गईं। इनमें टिटहरी, चील और कबूतर समेत 13 प्रजातियों को विमानों के लिए अधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। वहीं, अमृतसर एयरपोर्ट क्षेत्र में 50 पक्षी प्रजातियां मिलीं, जिनमें आठ को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में शामिल किया गया है।
टेकऑफ और लैंडिंग के समय बढ़ता है खतरा
जौलीग्रांट एयरपोर्ट पर पक्षियों की संख्या और उनकी गतिविधियां विमान संचालन के लिए चुनौती बन रही हैं। रनवे और उड़ान मार्ग के आसपास पक्षियों की मौजूदगी से विमानों के टेकऑफ और लैंडिंग के दौरान बर्ड स्ट्राइक की आशंका बढ़ जाती है।
अध्ययन के मुताबिक, बड़े आकार के पक्षियों के विमान से टकराने पर नुकसान की आशंका ज्यादा रहती है। कुछ समय पहले जौलीग्रांट एयरपोर्ट पर पक्षियों की मौजूदगी के कारण एक विमान को लैंडिंग से पहले काफी देर तक हवा में चक्कर लगाना पड़ा था।
सियार, साही और खरगोश भी एयरपोर्ट परिसर में पहुंचे
जौलीग्रांट एयरपोर्ट पर सिर्फ पक्षी ही नहीं, बल्कि कुछ वन्यजीवों की मौजूदगी भी सामने आई है। कैमरा ट्रैप के जरिए एयरपोर्ट क्षेत्र में सियार, साही और खरगोश जैसे वन्यजीव दर्ज किए गए हैं। इनके एयरपोर्ट परिसर तक पहुंचने से विमान संचालन प्रभावित होने की स्थिति सामने आई है।

डब्ल्यूआईआई के सेमिनार में 60 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत
भारतीय वन्यजीव संस्थान के 37वें वार्षिक अनुसंधान सेमिनार में वन्यजीव और जैव विविधता से जुड़े 60 से अधिक शोध पत्र और 41 पोस्टर प्रस्तुत किए गए। दो दिवसीय सेमिनार के दूसरे दिन आठ तकनीकी सत्र आयोजित हुए।
इन सत्रों में वन्यजीव संरक्षण, पुनर्स्थापन, आवास और जैव विविधता में बदलाव, वन्यजीव गलियारे, आबादी आकलन, पर्यावरणीय बदलाव और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे विषयों पर शोध प्रस्तुत किए गए।
शोध समन्वयक बिवाश पांडव ने पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक विज्ञान, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और तकनीक को जोड़कर संरक्षण के प्रयास आगे बढ़ाने पर जोर दिया। अपर वन महानिदेशक (वन्यजीव), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय रमेश कुमार पांडे ने सेमिनार को शोधकर्ताओं के बीच विचारों, आंकड़ों और पद्धतियों के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण मंच बताया।
सेमिनार की अध्यक्षता डब्ल्यूआईआई के पूर्व निदेशक और वरिष्ठ वन्यजीव वैज्ञानिक जीएस रावत ने की। उद्घाटन सत्र में वैज्ञानिकों और शोधार्थियों के पांच महत्वपूर्ण प्रकाशनों का विमोचन किया गया। डब्ल्यूआईआई निदेशक जीएस भारद्वाज ने कहा कि यह सेमिनार शोध को विशेषज्ञों के सामने रखने और उनकी प्रतिक्रिया के जरिए उसकी गुणवत्ता व प्रासंगिकता बढ़ाने का मंच है।


