2.20 करोड़ का इनाम, 55 से ज्यादा केस; कौन है माओवादी असीम मंडल, सरेंडर के बाद क्यों अहम हुई पूछताछ
रांची: माओवादी संगठन के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे असीम मंडल ने आत्मसमर्पण कर दिया है। मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी के बाद असीम मंडल को झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल क्षेत्र में माओवादी संगठन के प्रमुख चेहरों में गिना जाता था। उस पर झारखंड और ओडिशा सरकार की ओर से कुल 2.20 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। इसमें झारखंड सरकार की ओर से एक करोड़ और ओडिशा सरकार की ओर से 1.20 करोड़ रुपये का इनाम शामिल था। झारखंड में उसके खिलाफ करीब 55 मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।
कॉलेज के दिनों से वाम उग्रवादी आंदोलन से जुड़ा
असीम मंडल पश्चिम मेदिनीपुर जिले के चंद्रकोना क्षेत्र के उत्तर फूलचुक का रहने वाला बताया जाता है। उसका माओवादी संगठन से जुड़ाव काफी पुराना है। 1980 के दशक में कॉलेज के दिनों में वह वाम उग्रवादी आंदोलन से जुड़ा और इसके बाद भूमिगत गतिविधियों में सक्रिय हो गया।
समय के साथ प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) में उसकी भूमिका बढ़ती गई। 2011 में माओवादी नेता किशनजी की मौत के बाद पश्चिम बंगाल में संगठन की जिम्मेदारी असीम मंडल को मिलने की बात सामने आई थी। इसके बाद वह सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी में संगठन के महत्वपूर्ण नेताओं में शामिल रहा।
झारखंड की कई माओवादी घटनाओं में नाम आया
असीम मंडल का नाम झारखंड में हुई कई माओवादी घटनाओं से भी जुड़ा बताया गया है। 1 मार्च 2026 को छोटानागरा थाना क्षेत्र के मरांगपोंगा में 209 कोबरा के एक असिस्टेंट कमांडेंट समेत दो सुरक्षाकर्मियों के घायल होने की घटना में उसका नाम सामने आया था।

इसके अलावा 12 अप्रैल 2025 को जाराईकेला के राधापोरा, 11 जनवरी 2023 को टोंटो के तुम्बाहाका, 31 मई 2020 को कराईकेला के जोंवा और 11 जुलाई 2018 को पूर्वी सिंहभूम के झाटी पहाड़ी से जुड़े मामलों में भी उसका नाम बताया गया है।
आत्मसमर्पण के बाद सुरक्षा एजेंसियों की पूछताछ
आत्मसमर्पण के बाद सुरक्षा एजेंसियां असीम मंडल से पूछताछ कर रही हैं। एजेंसियां माओवादी नेटवर्क, संपर्क सूत्रों, हथियार और गोला-बारूद के ठिकानों, भूमिगत ठिकानों तथा संगठन की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी हासिल करने का प्रयास कर रही हैं।
लंबे समय तक संगठन के शीर्ष स्तर पर सक्रिय रहने के कारण सुरक्षा एजेंसियों के लिए असीम मंडल से पूछताछ अहम मानी जा रही है। उसके आत्मसमर्पण को झारखंड में माओवादी विरोधी अभियान के लिहाज से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।


