झारखंड में 290 करोड़ के बैंक घोटाले पर ED की बड़ी कार्रवाई, कई ठिकानों पर छापेमारी; डिजिटल सबूत जब्त
झारखंड से बंगाल तक कई ठिकानों पर छापेमारी
ईडी की टीमों ने चांडिल के अलावा पश्चिम बंगाल के हावड़ा, हुगली जिले के उत्तरपाड़ा, लेक टाउन और आसनसोल में भी तलाशी अभियान चलाया। इन स्थानों पर कंपनी से जुड़े चार्टर्ड अकाउंटेंट और अन्य सहयोगियों के ठिकानों की जांच की गई।
वहीं, चौका थाना क्षेत्र के खूंचीडीह स्थित बंद कोहिनूर स्टील कंपनी परिसर में भी अधिकारियों ने करीब आठ घंटे तक तलाशी ली। इस पूरी कार्रवाई की वीडियोग्राफी भी कराई गई। जांच के दौरान कई अहम वित्तीय दस्तावेज और डिजिटल सबूत हाथ लगने की जानकारी सामने आई है।
66 मेगावाट का पावर प्लांट लगाने के नाम पर लिया 290 करोड़ का कर्ज
जांच के अनुसार, कोहिनूर पावर कंपनी ने खूंचीडीह गांव में 66 मेगावाट क्षमता का बिजली संयंत्र स्थापित करने के नाम पर वर्ष 2008 से 2013 के बीच बैंक ऑफ बड़ौदा के नेतृत्व वाले बैंकों के समूह से 290 करोड़ रुपये की क्रेडिट सुविधा हासिल की थी।
आरोप है कि कर्ज की इस रकम का इस्तेमाल प्रस्तावित बिजली संयंत्र के निर्माण में करने के बजाय समूह से जुड़ी 100 से अधिक मुखौटा कंपनियों के बैंक खातों में भेज दिया गया। जांच में कंपनी के प्रमोटर विजय बोथरा, प्रशांत बोथरा और उनके परिजनों पर कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों और वित्तीय हेराफेरी के जरिए कोलकाता में अचल संपत्तियां खरीदने के आरोप भी सामने आए हैं।
बैंकों को 290 करोड़ के कर्ज में से मिले सिर्फ 7 करोड़
इस मामले में वर्ष 2018 में राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) में दिवालिया प्रक्रिया शुरू हुई थी। इसके बाद 2019 में परिसमापन की कार्रवाई के दौरान बैंकों को महज 7 करोड़ रुपये ही वापस मिल सके।
इससे बैंकों को कर्ज की कुल रकम का 97.5 प्रतिशत से अधिक नुकसान उठाना पड़ा। कथित घोटाले में कर्ज की रकम के इस्तेमाल और संपत्तियों की खरीद से जुड़े पहलुओं की जांच की जा रही है।
दिखावटी निर्माण के आधार पर कर्ज हासिल करने का आरोप
जानकारी के मुताबिक, कोहिनूर ग्रुप ने वर्ष 2005 में झारखंड सरकार के साथ बिजली संयंत्र और स्टील उद्योग स्थापित करने के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) किया था। आरोप है कि इसके बाद जमीन लेकर वहां केवल दिखावटी ढांचा तैयार किया गया और इसी आधार पर बैंकों से भारी कर्ज मंजूर करा लिया गया।
वर्ष 2015 में बैंकों ने कंपनी के ऋण खाते को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित कर दिया था। इसके बावजूद वर्ष 2016 तक भी प्रस्तावित निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका। फिलहाल कंपनी का कार्यालय और प्लांट लंबे समय से बंद पड़े हैं।

