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Mahabharat Facts: क्यों कांपते थे राजा भी शिशुपाल की किस्मत से? जानिए क्यों श्रीकृष्ण ने गिन-गिनकर माफ किए उसके 100 अपराध

महाभारत केवल एक युद्धग्रंथ नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं और प्रसंगों का महासंग्रह है, जिनमें हर निर्णय के पीछे गहरी वजह और धर्म का संतुलन छिपा है। खासकर भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े प्रसंग आज भी लोगों के मन में सवाल खड़े करते हैं। ऐसा ही एक रहस्य शिशुपाल से जुड़ा है, जिसे कृष्ण ने बार-बार अपमान करने के बावजूद 100 अपराधों तक दंडित नहीं किया। आखिर क्यों न्याय के प्रतीक श्रीकृष्ण ने शिशुपाल को इतनी छूट दी और क्यों 101वीं गलती उसके जीवन की आखिरी साबित हुई?

शिशुपाल का रहस्यमयी और भय पैदा करने वाला जन्म

शिशुपाल श्रीकृष्ण की बुआ का पुत्र था। उसके जन्म के साथ ही एक अनहोनी जुड़ी थी। जन्म के समय शिशुपाल के तीन नेत्र और चार भुजाएं थीं। यह दृश्य देखकर उसके माता-पिता भयभीत हो गए और इसे किसी बड़े संकट का संकेत मानने लगे। तभी आकाशवाणी हुई कि इस बालक को त्यागा नहीं जाए। यह भी कहा गया कि जिस व्यक्ति की गोद में आते ही उसकी एक आंख और एक हाथ अपने आप लुप्त हो जाएंगे, वही आगे चलकर उसके जीवन का अंत करेगा।

कृष्ण की गोद में आते ही पूरा हुआ आकाशवाणी का संकेत

कुछ समय बाद शिशुपाल को जब श्रीकृष्ण की गोद में रखा गया, तो आकाशवाणी के अनुसार उसकी एक आंख और एक हाथ स्वतः गायब हो गए। यह देखकर कृष्ण की बुआ भय और चिंता से भर उठीं। उन्होंने तुरंत श्रीकृष्ण से अपने पुत्र की रक्षा की प्रार्थना की और उसकी भूलों को क्षमा करने का अनुरोध किया।

बुआ को दिया गया वचन और 100 अपराधों की सीमा

श्रीकृष्ण ने बुआ को आश्वस्त करते हुए स्पष्ट कहा कि वे शिशुपाल के 100 अपराधों तक उसे क्षमा करेंगे, लेकिन 101वीं गलती पर उसे दंड अवश्य मिलेगा। यह वचन केवल पारिवारिक स्नेह नहीं, बल्कि धर्म और मर्यादा से जुड़ा एक संकल्प था, जिसमें करुणा और न्याय दोनों का संतुलन दिखता है।

रुक्मणि विवाह से बढ़ी शिशुपाल की नफरत

शिशुपाल, रुक्मणि के भाई रुक्म का घनिष्ठ मित्र था और वह स्वयं रुक्मणि से विवाह करना चाहता था। रुक्म इस रिश्ते के पक्ष में था, लेकिन रुक्मणि के माता-पिता श्रीकृष्ण से विवाह के इच्छुक थे। परिस्थितियां बदलीं और रुक्म ने जबरन रुक्मणि का विवाह शिशुपाल से तय कर दिया। इसी बीच रुक्मणि ने श्रीकृष्ण को संदेश भेजा और कृष्ण उसे अपने साथ ले गए तथा विवाह किया। यहीं से शिशुपाल के मन में कृष्ण के प्रति गहरी नाराजगी और द्वेष जन्म ले चुका था।

राजसूय यज्ञ की सभा और शिशुपाल का खुला अपमान

जब युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया, तो देश-देशांतर के बड़े राजा इसमें शामिल हुए। इस यज्ञ में श्रीकृष्ण और शिशुपाल दोनों उपस्थित थे। सभा के दौरान जब युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को सर्वोच्च सम्मान दिया, तो शिशुपाल अपना आपा खो बैठा। उसने भरी सभा में कृष्ण के खिलाफ अपमानजनक शब्द कहने शुरू कर दिए। श्रीकृष्ण शांत रहे और अपने वचन के अनुसार हर अपमान को मौन रहकर सहते रहे, जबकि शिशुपाल की गालियों की गिनती बढ़ती चली गई।

101वीं गलती और सुदर्शन चक्र का निर्णय

जब शिशुपाल 100 अपमान पूरे कर चुका और 101वीं गाली देने ही वाला था, उसी क्षण श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र उठाया। वचन की सीमा पूरी होते ही कृष्ण ने धर्म के अनुसार निर्णय लिया और सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का अंत कर दिया। यह वही क्षण था, जब श्रीकृष्ण ने प्रेम, वचन और धर्म—तीनों का निर्वहन एक साथ किया।