इतिहास और रहस्य का संगम: जहां 45 दिन रुके तात्या टोपे, वही रकमगढ़ किला बना भूतिया कथाओं का केंद्र
जयपुर। राजस्थान के राजसमंद जिले से करीब 10 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित रकमगढ़ किला इतिहास की उन धरोहरों में शामिल है, जहां आज़ादी की लड़ाई की गूंज और रहस्य की परछाइयां साथ-साथ चलती हैं। छोटी पहाड़ी पर बना यह किला वर्तमान में खेड़ाना पंचायत क्षेत्र में आता है और इसका ऐतिहासिक संबंध एशिया की प्राचीनतम मीठे पानी की कृत्रिम झीलों में गिनी जाने वाली राजसमंद झील से भी जुड़ा माना जाता है। आकार में छोटा होने के बावजूद रकमगढ़ किला अपने भीतर आज़ादी के संग्राम से लेकर लोककथाओं तक की कई परतें समेटे हुए है।
स्वतंत्रता संग्राम में रकमगढ़ की अहम भूमिका
इतिहासकारों के अनुसार, इस किले का निर्माण कोठारिया रियासत के तत्कालीन राव साहब ने करवाया था। 1857 की क्रांति के दौर में रकमगढ़ किला उस समय सुर्खियों में आया, जब महान क्रांतिकारी तात्या टोपे ने अंग्रेजों से बचते हुए यहां करीब 45 दिनों तक शरण ली। जैसे ही अंग्रेजों को इसकी जानकारी मिली, उन्होंने किले पर धावा बोल दिया। हालात बिगड़ते देख तात्या टोपे ने कोठारिया राव जी से सहायता मांगी, जिसके बाद कोठारिया किला और रकमगढ़ के बीच तोपों से भीषण गोलाबारी हुई। आज भी किले की दीवारों पर उस संघर्ष के निशान मौजूद बताए जाते हैं।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के आने की कथाएं
लोक इतिहास में यह भी कहा जाता है कि जब झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को तात्या टोपे पर हुए हमले की सूचना मिली, तो वे स्वयं उनकी मदद के लिए रकमगढ़ किले तक पहुंचीं। अंग्रेजों को पीछे हटाने के बाद तात्या टोपे ने यह स्थान छोड़ दिया, लेकिन किला आज भी उनके साहस, रणनीति और बलिदान की मूक गवाही देता हुआ खड़ा है।
रहस्यमय कहानियों ने बढ़ाया कौतूहल
इतिहास के साथ-साथ रकमगढ़ किला अपनी रहस्यमय कहानियों के कारण भी चर्चित है। आबादी से दूर पहाड़ी पर स्थित होने के कारण आसपास के गांवों में यहां भूत-प्रेत और अदृश्य शक्तियों की कहानियां वर्षों से सुनाई जाती रही हैं। ग्रामीणों का विश्वास है कि तात्या टोपे और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपना सुरक्षित खजाना इसी किले की जमीन में कहीं दबाया था। इसी मान्यता के चलते अतीत में कई लोगों ने किले के भीतर 5 से 10 फीट तक गहरे गड्ढे भी खोदे।
काले सांप की लोककथा और डर
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, किले के पास दो लोक देवताओं के मंदिर स्थित हैं। मान्यता है कि एक विशाल काला सांप उस कथित खजाने की रखवाली करता है और उसके सिर पर धार्मिक चिन्ह मौजूद हैं। कुछ लोगों का दावा है कि जिन्हें सपने में माताजी के दर्शन होते हैं, वे बिना किसी नुकसान के खजाना निकाल सकते हैं। हालांकि, अतीत में सांप के काटने से कुछ लोगों की मौत की घटनाएं भी सामने आई हैं, जिसने इन कथाओं को और रहस्यमय बना दिया।
संरक्षण के अभाव में खंडहर बनता किला
वर्तमान में रकमगढ़ किला कोठारिया राजपरिवार की निजी संपत्ति माना जाता है। निजी स्वामित्व और उत्तराधिकार से जुड़े कारणों के चलते, पुरातत्व विभाग के दायरे में होने के बावजूद इसकी समुचित देखरेख नहीं हो पा रही है। संरक्षण के अभाव में किला धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होता जा रहा है, लेकिन इसकी जर्जर दीवारें आज भी स्वतंत्रता संग्राम, वीरता और लोककथाओं की अनकही दास्तान सुनाती हैं।
रकमगढ़ किला सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि आज़ादी की लड़ाई, शौर्य और रहस्य का जीवंत प्रतीक है। एक ओर यह तात्या टोपे और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीर गाथाओं की याद दिलाता है, तो दूसरी ओर भूतिया कथाओं और किंवदंतियों के कारण आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
